कल्पना कीजिए, एक करोड़पति बिजनेसमैन का आलीशान घर हो और वहां सुबह-सुबह गोली चलती है, लेकिन कोई चीखता नहीं। फिर लाश के टुकड़े नीले ड्रम में ठूंस दिए जाते हैं। ये कोई फिल्म की स्क्रिप्ट नहीं, बल्कि लखनऊ के आशियाना इलाके की सच्ची घटना है, जो 20 फरवरी 2026 को सामने आई। उसके बाद पूरे देश में सनसनी फ़ैल गई.
मामला यह कि 19 साल का अक्षत प्रताप सिंह ने अपने पिता मानवेंद्र सिंह को लाइसेंसी राइफल से गोली मार दी। मानवेंद्र पैथोलॉजी लैब्स और शराब की दुकानों के मालिक थे, और पूरे मोहल्ले में मशहूर अपनी उदारता के लिए जाने जाते थे। लेकिन घर के अंदर का गुस्सा बाहर नहीं दिखा। अक्षत ने खुद कबूला कि पढ़ाई को लेकर झगड़ा इतना भड़का कि उसने ट्रिगर दबा दिया। ओर अपने ही पिता को मौत घाट उतार दिया।
घटना की वो खौफनाक रात और सुबह
सब कुछ 19 फरवरी की रात से शुरू हुआ। मानवेंद्र एक शादी से लौटे, तो अक्षत से बहस हो गई। वो तीसरी मंजिल के कमरे में सो गए, लेकिन अक्षत जागता रहा। साढ़े चार बजे सुबह, उसने अपने पिता की राइफल उठाई और सोते हुए मानवेंद्र के सिर में गोली मार दी। आवाज सुनकर 17 साल की बहन कीर्ति दौड़ी आई, लेकिन भाई ने धमकी दी—चुप रहो वरना तुम्हें भी मार दूंगा।
कीर्ति चुप रही, यहां तक कि दोस्त के घर पढ़ाई पर गई तो भी उसने कुछ नहीं बोला। फिर अक्षत ने लाश को ग्राउंड फ्लोर ले जाकर आरी से काटा और हाथ-पैर ,सिर को अलग कर दिया । जिसके बाद सिर और अंगों को सदरौना इलाके में फेंक आया, धड़ नीले ड्रम में बंद कर छिपा दिया। फिर बहन के लिए पिज्जा ऑर्डर किया और बाजार गया आरी लाने। सोचिए, कैसी पिता ने कभी यह नहीं सोचा होगा कि जिस बच्चें को वो दिलो जान से पाल रहे हैं वो कभी ऐसा भी कर सकता है.
पड़ोसियों को बोला, “पापा दिल्ली गए हैं।” लेकिन अगले दिन मानवेंद्र नजर नहीं आए। वही तीनो फोन स्विच ऑफ, आ रहे थे. इसपर शक हुआ ओर सीसीटीवी खंगाले गए.सीसीटीवी में घर लौटते दिखे लेकिन जाते नहीं। चाचा शक्तिवर्धन और पड़ोसियों ने गुमशुदगी रिपोर्ट लिखाई। व्हाट्सएप ग्रुप बना “मानवेंद्र मिसिंग अपडेट”। पूछताछ में अक्षत फंस गया, घर ले जाकर नीला ड्रम खोला तो सच बाहर।
गुस्से की जड़: नीट का दबाव या कुछ और?
मानवेंद्र चाहते थे अक्षत डॉक्टर बने, नीट क्रैक कर बिजनेस संभाले। अक्षत बीकॉम कर रहा था, दो बार नीट फेल हो चुका। चार साल पहले इसी बात पर घर छोड़ भागा था। पुलिस के डीसीपी सेंट्रल जोन कहते हैं, रात को बहस हुई, मानवेंद्र ने राइफल तानी धमकाया, फिर अक्षत ने उसी से गोली चला दी।
एक पुराना चोरी का केस भी जोड़ा जाता है—चार महीने पहले घर से गहने गायब हुए थे जो अक्षत ने चुराए थे। पिता ने रिपोर्ट वापस ले ली, लेकिन निगरानी बढ़ा दी। रोज टोकने से अक्षत चिढ़ गया। परिवार मानता नहीं कि नीट ही वजह,से यह सब हुआ,कहते हैं कुछ और गहरा राज है। लेकिन फिलहाल ये साफ है कि पारिवारिक तनाव ने हिंसा को जन्म दिया।
पुलिस की जांच और समाज का आईना
पुलिस ने अक्षत को रस्सियों में बांधकर घर रिक्रिएट करवाया। पोस्टमॉर्टम हो चुका है ,फॉरेंसिक सबूत जोड़ रही। वही कई सवाल उठते की—गोली की आवाज क्यों नहीं सुनी गई? बहन इतनी डरी क्यों रही? लखनऊ में नीले ड्रम वाला ये तीसरा केस हैं लगभग, पहले भी इसी तरह लाशें मिलीं। क्रिमिनोलॉजिस्ट कहते हैं, ऐसे कांड अक्सर दबे गुस्से से फूटते हैं, खासकर सिंगल पेरेंट घरों में ज्यादा देखने को मिलते हैं।
भारत में हर साल 30% फैमिली मर्डर बच्चों द्वारा होते हैं, NCRB डेटा के मुताबिक। ये केस दिखाता है कि अमीर घरों में भी भावनात्मक खालीपन घातक हो सकता है। अक्षत अब हिरासत में, लेकिन बहन की चुप्पी और मोहल्ले की दोस्ती पर सवाल बाकी।
ये कहानी सिर्फ एक हत्याकांड नहीं, बल्कि गुस्से, उम्मीदों और टूटे रिश्तों की है। मानवेंद्र जैसे पिता की मौत हमें सोचने पर मजबूर करती है—क्या हम अपने बच्चों की सुनते हैं, या सिर्फ थोपते हैं? लखनऊ पुलिस इस मामले को गहराई से खंगाल रही, लेकिन जो सच सामने आया, वो रोंगटे खड़े कर देता है।









